शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

संकट में लाडली



कैसे बनेगी लाडली लक्ष्मी
एक तरफ मध्य प्रदेश सरकार बेटियों को बचाने और लाडलियों को लक्ष्मी बनाने पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही हैं। बेटियों की शादी के लिए मुख्यमंत्री कन्यादान योजना लागू है। लेकिन अब यही लाडलियां संकट में आ गई हैं। हालात ये हैं कि गांव हो या कस्बा, शहर बड़ा हो या छोटा, इलाका आबाद हो या सुनसान... लाडलियां हर जगह बदमाशों के निशानों पर हैं। जी हां ये हकीकत केवल हमारी जुबानी नहीं, बल्कि हैवानियत की उन तमाम कहानियों से भी बयां होती हैं, जिन्होंने हर खास और आम को झकझोर कर रख दिया है। हालात ये हैं कि अब तो प्रदेश की राजधानी में भी लाड़लियां महफूज नहीं रह गईं हैं। भोपाल के अरेरा कॉलोनी में भी परिचित बनकर दगा देने वाले मुस्तफा ने भी कुछ ऐसा ही किया। मुस्तफा ने अपने साथी के साथ मिलकर 10 वीं की छात्रा का पहले तो अपरहण किया, फिर उसे दरिंदगी का शिकार बनाया और फिर हत्या तक कर डाली। इससे पहले भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिसने लाड़लियों की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं।

28 सितंबर 2012, इंदौर में 6 साल की मासूम की दर्दनाक मौत, सौतेले मां-बाप ने दीवार पर फेंककर की हत्या। 

21 सितंबर 2012, जबलपुर में छात्रा का MMS, अश्लील सीडी बनाकर ब्लैकमेल करने का मामला। 

18 फरवरी 2012, इंदौर में दो युवतियों से गैंगरेप, अश्लील MMS बनाकर किया सार्वजनिक।
कितनी महफूज हैं लाडलियां
ये तो महज वो मामले हैं जो ताजा है और लोगों के जेहन में जिंदा भी है। अगर आंकड़ों की बात करें तो मध्य प्रदेश में एक जनवरी 2012 से 20 जून 2012 तक यानी 170 दिनों में कुल 1,687 महिलाओं की आबरू तार-तार हुई। जिनमें 858 नाबालिग हैं, यानी हर दिन 5 लाडलियों को प्रदेश में कहीं-न-कहीं ज्यादती का शिकार होना पड़ रहा है। प्रदेश के गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता ने विधानसभा में एक प्रश्न के जवाब में जो जानकारी दी, ये आंकडे उन्हीं की बानगी है। इतना ही नहीं NCRB यानी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, देश में साल 2011 में बलात्कार के कुल 24,206 मामले सामने आए। और यहां भी बलात्कार के मामलों में मध्य प्रदेश सबसे आगे रहा। जहां 1,262 मामले दर्ज हुए। बहरहाल इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रदेश में लाड़लियां कितनी सुरक्षित हैं। ये आंकड़े किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता की बात भी हैं और गुस्से की वजह भी। 


महेश मेवाड़ा
पत्रकार

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

पाकिस्तान में मुगल-ए-आजम!


कहते हैं इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपता... पाकिस्तान की सियासत में भी इन दिनों मोहब्बत को लेकर कुछ ऐसे ही हालात बने हुए हैं... मानो इश्क को लेकर शहजादे सलीम ने अपने पिता अकबर के खिलाफ मोर्चा खोल दिया हो... हम बात कर रहे हैं पाक राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के 24 साल के बेटे बिलावल भुट्टो की... जो अपने देश की युवा विदेशमंत्री हिना रब्बानी खार के कथित प्यार में पागल हैं... चर्चा तो ये भी है कि हिना कथित प्रेम संबंधों को लेकर अपने पद से इस्तीफा भी दे सकती हैं... सोशल नेटवर्किंग मीडिया और कुछ वेबसाइटों के मुताबिक, हिना के इश्क में बिलावल के इस तरह दीवाना होने से जरदारी काफी खफा हैं... और वो हिना को बुलाकर अपने बेटे के साथ कथित प्यार की पींगे बढ़ाने को लेकर नाराजगी भी जाहिर कर चुके हैं... सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक राष्ट्रपति के सामने इन रिश्तों का खुलासा उस वक्त हुआ था... जब हिना ने बिलावल को ईद-उल-फितर के मौके पर गुलदस्ते के साथ एक खत भेजा... जिसमें लिखा था, "कोई शक नहीं कि हमने काफी इंतज़ार कर लिया है, और क्या यह समय इंतज़ार को खत्म करने का नहीं है... ईद मुबारक" बताया जाता है कि इसके बाद ही जरदारी ने हिना को तलब किया... लेकिन हिना ने बेहद सख्ती से जरदारी की आलोचना करते हुए उन्हें उनकी जाती जिंदगी में दखलअंदाजी न करने की हिदायत दे दी... इतना ही नहीं हिना ने जब इस मामले में बिलावल से बात की... तो बिलावल ने भी पीपीपी के चेयरमैन पद से इस्तीफा देने और साल के आखिर तक देश छोड देने की धमकी दे डाली... अब इसे पाकिस्तान में 'मुगल-ए-आजम'! ही कहेंगे कि मोहब्बत की खातिर बिलावल और उनके पिता जरदारी के बीच तनाव पैदा हो गया है...
बहरहाल जिस पाकिस्तान में औरतों की तरक्की को लेकर घमासान मचा रहता है... वहां सबसे कम उम्र की विदेश मंत्री बनकर हिना खार रब्बानी सुर्खियों में आई... और उन्होंने अपने बेपनाह हुस्न से पूरी दुनिया को अपना दिवाना बना दिया... भारत दौरे के दौरान भी हिना ने खूब सुर्खियां बटोरी... कभी उनका पहनावा चर्चा में रहा... तो कभी उनकी मोतियों की माला... इतना ही नहीं हिना जो भी पहनती हैं... हर किसी की निगाहें उनपर आ टिकती... लेकिन इस बार वो सुर्खियों में अपनी मोहब्बत को लेकर... पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में एक 19 नवंबर 1977 को इस हुस्न की मलिका का जन्म एक रसूखदार परिवार में हुआ... साल 1999 में उन्होंने लाहौर यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट साइंस में बीएससी ऑनर्स किया... इसके बाद अमेरिका की मैसाचुसेट्स यूनिवर्सिटी से होटल मैनेजमेंट की डिग्री ली... इसी दौरान हिना ने पाकिस्तान के अरबपति कारोबारी फिरोज गुलजार से निकाह किया... और उनकी दो बेटियां भी हैं... जिनका नाम है अनन्या और दीना... लेकिन खबर की माने तो 35 साल कि हिना अपने से 11 साल छोटे पाकिस्तान के युवराज बिलावल के प्यार में इस कदर फना हैं... कि वो अपनी शादीशुदा जिंदगी को भी खत्म करने को तैयार हैं...
सियासत की इस हाईप्रोफाइल मोहब्बत को लेकर इंटरनेट पर भी धमाका मचा है... हिना और बिलावल के कथित प्यार को लेकर पूरी दुनिया के लोगों ने कई तरह के ट्विट किए हैं... कोई इस मोहब्बत को सच मान रहा है... तो कुछ इसे महज अफवाह करार दे रहे हैं... ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है... जो मान रहे हैं कि ये केवल पब्लिसिटी स्टंट है... लेकिन फिर भी कुछ लोग ऐसे हैं... जो पाकिस्तान की सियासत के इन दो खूबसूरत चेहरों की मोहब्बत को पाक मान रहे हैं... पाकिस्तान में ये लव स्टोरी अब मुगले-आजम बन चुकी है... रील लाइफ में सलीम, शहंशाह अकबर के शहजादे थे... बिलावल और जरदारी का रिश्ता भी बाप-बेटे का ही है... बस ट्विस्ट है तो अनारकली को लेकर... पाकिस्तान की इस मुगले-आजम में अनारकली कोई आम नाचने वाली नहीं जिसे शहंशाह दीवार में चुनवा दें... वो पाकिस्तान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में जानी-पहचाने जाने वाली शख्सियत है... ऐसे में जरदारी अपनी मर्जी से इस लव-स्टोरी का मुकद्दर तय कर पाएंगे... ये मुमकिन नहीं दिख रहा... वैसे भी ये कहानी जिस तरह क्लाइमेक्स की ओर बढ़ रही है... आसार इसी बात के ज्यादा दिख रहे हैं कि इस कहानी का दि एंड सलीम और अनारकली खुद अपने हाथों से लिखें... महेश मेवाड़ा पत्रकार

मंगलवार, 13 मार्च 2012

'शिव' का सफर

वो लड़ता था हक की लड़ाई... धार्मिक कार्यों से था जुड़ाव... कुछ कर गुजरने का था जुनून... वो है प्रदेश की राजनीति का महारथी... ये उस पांव-पांव वाले भैया की हकीकत है...जिसे लोग सीना चोड़ा करके सुनाते हैं... सीहोर जिले की बुधनी तहसील के छोटे से गांव जैत में 5 मार्च 1959 को जन्में शिवराज सिंह चौहान की कुछ कर जुगरने की चाहत घर से ही शुरू हो गई थी...उन्होंने छोटी उम्र में ही ऐसे फैसले लेने शुरू कर दिए थे...जो उनके घरवालों को भी परेशानी में डाल देते थे...उनके चाचा की मानें तो सबसे पहले उन्होंने गरीब मजदूरों के हक की आवाज बुलंद कर उनका बाजिव हक दिलाया... मुख्यमंत्री बचपन से गांव के मंदिर में भजन-कीर्तन और रामायण का पाठ किया करते थे...साथ ही चौपाल लगाकर लोगों की समस्या सुनने में उन्हें बेहद खुशी मिलती थी... छोटे से गांव से प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने तक के सफर में शिवराज सिंह चौहान ने अपने जीवन और राजनीति में कई उतार-चढ़ाव देखे...घर वालों के दबाव के बाद भी साल 1972 से ही वो संघ से जुड़ गए... और छात्र नेता से लेकर आपात काल के दौरान भूमिगत रहकर भी उन्होंने संघ के लिए काम किया... जिसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा... इसी उठापटक के बीच घरवालों की मर्जी के चलते वो साधना सिंह के साथ शादी के बंधन में बंध गए... शिवराज सिंह चौहान ने भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष का भी जिम्मा बसूबी निभाया... और 29 नवंबर 2005 को प्रदेश के 17 वें मुख्यमंत्री के तौर पर प्रदेश की बागडोर संभाली...इस दौरान उनके कई अनूठे रंग भी देखने को मिले...कभी वो तैरते नजर आए... तो कभी किसान बनकर खेती का जायजा लिया... इतना ही नहीं वो दो-दो चश्मा लगाते हुए भी दिखे... तो कभी मग्न होकर आरती गाते नजर आए... बहरहाल मध्यप्रदेश में गैर कांग्रेसी सरकार के पांच साल पूरे करने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शुरु से ही देशसेवा करना चाहते थे...छोटे से गांव में जन्में शिवराज ने गरीब-मजदूरों के हक की लड़ाई छोटी उम्र में ही शुरू कर दी थी...एमए फिलॉस्पी से गोल्ड मेडलिस्ट शिवराज ने कार्यकर्ता से लेकर मुख्यमंत्री बनने तक का सफर लोगों की सेवा करते ही तय किया...बहरहाल प्रदेश के मुखिया को उनके 53 वें जन्मदिन पर करोड़ों लोग ढेर सारी शुभकामनाएं दे रहे हैं...

बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

फनकार की आपबीती


इंसान के अंदर छिपी प्रतिभा आखिर क्यों दब जाती है। और क्यों ये मतलब परस्त दुनिया एक काबिल इंसान को निराशा के गहरे समंदर में डुबोकर मार देती है। एक फनकार की कहानी सुनकर कुछ ऐसा ही लगा कि मानो जैसे उसने इस मतलबी दुनिया को समझने में भूल की। "मिट नहीं सकता कभी लिखा हुआ तकदीर का"...... संसार फिल्म के इस गीत को वृद्धाश्रम में गुमनामी की जिंदगी बसर कर रहे दिवाकर जोशी ने जब लिखा होगा। तब सोचा भी नहीं होगा कि उनको ऐसे हालातों से गुजरना पड़ेगा। दिवाकर का अतीत जानकर कोई भी हैरत में पड़ जाए कि क्या वाकई किस्मत इतनी करवट बदलती है। उदार प्रवृत्ति के जोशी ने विनोवा भावे की अपील पर बचपन में ही अपने हिस्से की जमीन देश को समर्पित कर दी। और निकल पड़े दुनिया की खाक छानने। बचपन से ही दिवाकर जोशी को गीत-कहानी लिखने का बड़ा शौक था। और यही रूची उन्हें खींचकर मुंबई की गलियों में ले गई। जहां इस फनकार ने राजकपूर की फिल्म आग समेत कई मशहूर गीत और कहानियां लिखी। जिन्हें मोहम्मद रफी और मुकेश जैसे गायकों ने अपनी आवाज से तराशा। राजकपूर की फिल्म आग का गीत "जिंदा हुं इस तरह कि गमे जिंदगी नहीं".... गीत को भी इसी फनकार ने लिखा था। लेकिन इस फनकार की लेखनी के सहारे बुलंदियां हासिल करने वाले फिल्मकारों और मतलब परस्तों ने ही उन्हें बेसहारा छोड़ दिया। अपने साथ हुए इस धोखे से आहत जोशी मुंबई को अलविदा कहकर घर लौट आए। इसके बाद उन्होंने राजनीति का भी रुख किया। और वहां भी उन्होंने अपना लोहा मनवाया। लेकिन यहां भी उन्हें धोखे के सिवा कुछ नहीं मिला। धोखे और अपनों की बेवफाई के बाद जोशी को दर-दर की ठोकरें भी खानी पड़ी। कई दिनों तक उन्हें भूखा रहना पड़ा। और वे बेसहारा यहां-वहां भटकते रहे। आखिर में वे पहुंचे भोपाल के एक वृद्धाश्रम में जहां गैरों से मिला अपनापन और वे वहीं के होकर रह गए। शोहरत और मुकाम के सच्चे हकदार इस फनकार को लोगों ने तो धोखा दिया ही साथ ही किस्मत ने भी इनके साथ खूब आंख-मिचौली खेली और वे गुमनामी के अंधेरों में खोते चले गए। बहरहाल एक बार फिर उन्हें सहारा मिला। और कवि के रूप में फिर से दिवाकर ने जादू बिखेरना शुरू कर दिया। इस तरह एक फनकार ने दुनिया से लड़कर खुद को जिंदा रखा।

रविवार, 5 फ़रवरी 2012

खामोशी...



मेरी खामोशी को तुम, क्यों समझ नहीं पाती हो...
जर्रे-जर्रे में तेरी खुशबू है, फिर मुझकों क्यों नहीं महकाती हो...
दिन-रात तेरी इबादत करता हूं, पर न जाने क्यों डरता हूं...
एक दिन तू मेरा बन जाएगा, ये उम्मीद मैं तुझसे करता हूं...
पर न जाने क्यों मैं डरता हूं, पर न जाने क्यों मैं डरता हूं....

साथ मिले गर तेरा मुझको, तो मैं दुनिया से लड़ जांऊगा...
हर पथ पर चलके साथ तेरे, मैं कुछ ऐसा कर जाऊंगा...
क्यों समझ कर भी तू मुझसे, अनजान बनी रहती है...
खामोशी को पहचानेगी तू, ये उम्मीद में तुझसे करता हूं...
पर न जाने क्यों मैं डरता हूं, पर न जाने क्यों मैं डरता हूं...


क्या डर है तुझको दुनिया का, एक बार बता दे मुझको...
या फिर मैं समझू की, तू है बस एक सुंदर सपना...
जो हर रात मुझे महकाता है, सुबह होते उड़ जाता है...
फिर भी तुझमें कुछ बात है साकी, क्यों मैं तुझसे उम्मीद करता हूं...
पर न जाने क्यों मैं डरता हूं, पर न जाने क्यों मैं डरता हूं...

महेश मेवाड़ा, पत्रकार

अग्निपथ....


वृक्ष हों भले खड़े,

हों घने हों बड़े,

एक पत्र छांह भी,

मांग मत, मांग मत, मांग मत,

अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ


तू न थकेगा कभी,

तू न रुकेगा कभी,

तू न मुड़ेगा कभी,

कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,

अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ


यह महान दृश्य है,

चल रहा मनुष्य है,

अश्रु श्वेत रक्त से,

लथपथ लथपथ लथपथ,

अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

हरिवंश राय बच्चन

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

कारवां गुजर गया...


स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क़ बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँ-धुआँ पहन गये,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ जमीन और आसमां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,
वक्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरण-चरण,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
ग़ाज एक वह गिरी,
पुंछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी,
और हम अजान से,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

गोपालदास "नीरज"

फिर हारा माटीपुत्र


एक हाथ रोटी बेलता...
दूसरा रोटी खाता...
तीसरा रोटी से खेलता...
ये तीसरा है कौन इसपर संसद भी है मौन...

आज किसानों की हालत कुछ इसी तरह की है... क्या है किसान... कौन है किसान... इससे किसी को वास्ता नहीं... क्योंकि किसान एक ऐसा तबका है... जो फसल उत्पादन का मजदूर है... और उसके उत्पाद का मौल भी वो तैयार करते हैं... जिसका इसकी हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है... मुंशी प्रेमचंद्र के साहित्य गोदान में जो स्थिति धनिया किसान की थी... वो आज भी हमारे आधुनिक भारत के किसान की है... धनिया और उसका परिवार एक गौ यानी गाय के लिए किस तरीके से अपना सब-कुछ न्यौछावर कर देता है... लेकिन उसे छोड़ने को तैयार नहीं... कुछ यही हाल किसान का है... वो भले ही कर्ज के बोझ में दबकर मरने को तैयार हो जाता है... लेकिन अपनी माटी छोड़ने को तैयार नहीं है... और न ही उसे किसी दूसरे को देने के लिए... वाकई आज भले ही कर्ज में डूबकर रोजाना 47 किसान आत्महत्या कर रहे हों... हजारों किसान कुदरत की मार झेलने को मजबूर हैं... लेकिन उन्हें सुनने वाला कौन है... फसल किसान उगाता है... सरकार नहीं... लेकिन फिर भी सरकार के जिम्मेदार तय करते हैं कि फसल खराब हुई है... या नहीं... क्यों उन किसानों से मशविरा नहीं किया जाता कि वाकई उनके खून पसीने से सींची फसल की हकीकत क्या है... सबसे पहले हमे इस बात को समझने की जरूरत है कि किसान आखिर किस वजह से तंग आकर मौत को गले लगा लेता है... क्यों धरती का सीना चीरकर अन्न पैदा करने वाला माटीपुत्र हार जाता है...

महेश मेवाड़ा, पत्रकार

सोमवार, 2 मई 2011

जागो नौजवानों....


हमारा देश इस समय सर्वाधिक युवा-देश है... भारत की जनगणना 2011 के अनन्तिम आकंड़ों के अनुसार देश की कुल जनसंख्या 1,21,01,93,422 है... इसमें करीब 55 फीसदी आबादी युवाओं की है... यानी देश की तकदीर और तस्वीर बदलने की जिम्मेदारी भी युवाओं के कंधो पर ही है... मैं मेवाड़ा, राजपूत, क्षत्रिय समाज की इस पत्रिका में इस बात का उल्लेख सिर्फ इस लिए कर रहा हूं...कि हमारे समाज में भी इस समय सबसे ज्यादा आबादी युवाओं की हैं.... और ये पीढ़ी ही हमारे समाज में फैली तमाम बुराईयों को दूर करने की कुब्बत रखती है... बस जरूरत है एक सशक्त मार्गदर्शन की... हमारे समाज में आज भी कई तरह की बुराईयां और कुरीतियां जड़ जमाएं हैं....जिनको दूर करने की बजाय हम खुद भी सामाजिक बंधन की आड़ में उन्हें चुप-चाप स्वीकार कर लेते हैं... छोटी उम्र में सगाई कर देना, पढ़ाई के प्रति संकुचित सोंच, लड़कियों को उच्च शिक्षा से दूर रखना, इतना ही नहीं आज भी हमारे समाज में बाल विवाह धड़ल्ले से हो रहे हैं... जिन्हें हमारे समाज के जिम्मेदार लोग ही बढ़ावा देते हैं... इतना ही नहीं कम उम्र में शादी होने के बाद कई संबंध बिगड़ जाते हैं...या फिर सामाजिक दबाव के चलते कई लोग ताउम्र उन्हें ढोते रहते हैं... और जो संबंध खराब हो जाते हैं उसमें झगड़ा देने की प्रथा है... जिसे न देनें पर कई तरह के उपद्रव मचाए जाते हैं... हम एक लोकतंत्र देश में रहते हैं... और ये ऐसी बुराईयां हैं जो हमारे समाज को एक छोटी मानसिकता की तरफ धकेलती हैं... और जिन्हें दूर करने की जरूरत आज हमारे समाज को और खासकर युवा वर्ग को है... मैं जानता हूं कि हमारे समाज का मुख्य व्यवसाय कृषि है... और हमें किसान या किसान पुत्र कहलाने से भी गुरेज नहीं करना चाहिए.... मैं ये भी जानता हूं कि युवाओं का मन चंचल होता है.....लेकिन मैं समाज के उन अनुभवी और वुद्धिजीवी लोगों से गुजारिश करना चाहूंगा कि वो अपने अनुभव और युवा सोच के सहारे ऐसे कठोर कदम उठाए... जिससे हमारे समाज की तस्वीर बदले... और हम सदियों से चली आ रही कुरीतियों के बंधनों से आजाद हो जाएं...जिनकी वजह से हमें खुद अपनी ही नजरों में गिरना पड़ता है... ऐसा भी नहीं कि हमारे समाज के युवा उन परंपराओं से भागते हों जो समाज को सम्मान दिलाती है.... ताजा उदाहरण है ग्राम देहरिया कला का जो कि भोपाल जिले में आता है... वहां के हमारे 22 बर्षीय युवा साथी बह्म मेवाड़ा ने अपने गांव में बर्षों से चली आ रही पटेल परंपरा को मुस्कुराते हुए स्वीकार किया... और आज गांव का पटेल होने के साथ-साथ समाज की तमाम बुराईयों को दूर करने में जुटा है... साथ ही वो युवाओं के लिए एक प्रेरणा बनकर भी उभरा हैं... ऐसा नहीं कि केवल परंपरा तक ही हमारे मेवाड़ा समाज के युवा सिमटे हैं... इससे इतर भी हमारे समाज के युवा शिक्षा, संस्कृति, राजनीति, और पत्रकारिता में भी समाज का नाम रोशन करने में जुटे हैं... सीहोर से नगर पालिका अध्यक्ष बनकर युवा साथी नरेश मेवाड़ा ने समाज के युवाओं को राजनीति में आने की प्रेरणा दी है.... फंदा के जिला पंचायत सदस्य राजू मेवाड़ा और यहीं के प्रमोद मेवाड़ा जनपद सदस्य बनकर इलाके के विकास में अपना योगदान दे रहें हैं.....साथ ही हमारे खजूरी के दिनेश मेवाड़ा और ढाबला के ज्ञानसिंह मेवाड़ा कम उम्र में सरपंच बनकर अपने गांव के विकास का जिम्मा उठाया है... बिलकिसगंज के विक्रम मेंवाड़ा टीलाखेड़ी में स्कूल संचालित करके समाज में ज्ञान की अलख जगा रहे हैं... और उनके स्कूल में पढ़े मैधावी छात्र प्रदेश ही नहीं देश में भी अपना और अपने परिवार का नाम रोशन कर रहे हैं.... हमारे समाज के युवा केवल शिक्षक, कर्मचारी और राजनीतिज्ञ ही नहीं बन रहे... बल्कि डॉक्टर, इंजीनियर और पत्रकार बनकर समाज को एक नई दिशा देने में जुटे हैं... इनके साथ-साथ हमारे पढ़े-लिखे नौजवान युवा साथी ढाबला के सुरेंद्र मेवाड़ा, केदार मेवाड़ा, बिलकिसगंज के नरेश मेवाड़ा, सुरेश मेवाड़ा, गजराज मेवाड़ा, प्रीतम मेवाड़ा, भारत मेवाड़ा, रामबाबू मेवाड़ा, अर्जुन मेवाड़ा रलाबती के राजेश मेवाड़ा, विक्रम मेवाड़ा, थूनां के राजेश मेवाड़ा, प्रह्लाद मेवाड़ा, दुपाड़िया दांगी के गिरवर मेवाड़ा, प्रह्लाद मेवाड़ा, देहरिया कला के राकेश मेवाड़ा, शादीलाल मेवाड़ा, नरेंद्र मेवाड़ा, अनार सिंह मेवाड़ा, ब्रिजिशनगर के प्रेमसिंह मेवाड़ा, राजेश मेवाड़ा ऐसे कई हमारे युवा साथी हैं.... जो समासेवी बनकर समाज में अलख जगाने के काम में जुटे हैं... इतना सब कुछ होने के बाद भी हमारे समाज में आज भी ये कुरीतियां डेरा डाले क्यों बैठी हैं... अब इन्हें जड़ से उखाड़ फेंकने का समय आ गया है.... और हम युवाओं को बिलकुल भी देर नहीं करते हुए अब जुट जाने की जरूरत है.... क्योंकि अब नहीं जागे तो हम कभी नहीं जाग पाएंगे... इसलिए अपने युवा साथियों से इतना ही कहना चाहूंगा... कि कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं होता... तबीयत से एक पत्थर तो उछालो यारों...

धन्यवाद
आपका अपना
महेश मेवाड़ा, पत्रकार
रायपुर (छत्तीसगढ़)

बस्तर की बाजी


बस्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी के तौर पर जाना जाता है... यहां का दशहरा देश ही नहीं विदेशों में भी विख्यात है... लेकिन नक्सली हिंसा की वजह से बस्तर अपनी रंगत खोता जा रहा है... सांसद बलीराम कश्यप के निधन के बाद बस्तर एक बार फिर लोकसभा उपचुनाव को लेकर सुर्खियों में है... बस्तर लोकसभा में चार जिले बीजापुर, नारायणपुर, दंतेवाड़ा और बस्तर आते हैं... जिनमें आठ विधानसभा कोंटा, बीजापुर, दंतेवाड़ा, जगदलपुर, बस्तर, चित्रकूट, नारायणपुर और कोंटागांव के मतदाता मतदान करते हैं.. ये पूरे इलाके धुर नक्सली माने जाते हैं... सबसे खास बात ये कि इन आठ विधानसभा में से सात सीटों पर भाजपा का कब्जा है... वहीं एक सीट कोंटा से कांग्रेस के प्रत्याशी कवासी लखमा ने जीत हासिल की थी...बस्तर लोकसभा के लिए हो रहे उपचुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही माना जा रहा है... भाजपा ने जहां बस्तर में सहानुभुती वोट बटोरने के लिए बलीराम कश्यप के बेटे दिनेश कश्यप पर भरोसा जताया है... दिनेश कश्यप वर्तमान में केंद्रीय सहकारी बैंक के अध्यक्ष हैं... और उनके छोटे भाई केदार कश्यप रमन सरकार में मंत्री हैं... वहीं प्रदेश कांग्रेस की गुटबाजी में इस बार जोगी खेमा बाजी मार ले गया... और विधायक कवासी लखमा पर कांग्रेस ने दाव लगाया है.... कवासी लखमा कोंटा विधानसभा क्षेत्र का तीन बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं... और वर्तमान में वे वहां से विधायक हैं... आम चुनाव की बात करें तो साल 1998 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मानकूराम सोढ़ी को हराकर बलीराम कश्यप पहली बार सांसद बने.. उन्होंने साल 1999 और 2004 में कांग्रेस प्रत्याशी महेंद्र कर्मा को मात दी...जिसके बाद साल 2009 के आम चुनाव में भी भाजपा ने बस्तर टाइगर बलीराम कश्यप पर ही भरोसा जताया... और उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार शंकर सोढ़ी और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के मनीष कुंजाम को हराकर जीत हासिल की... इस लिहाज से भाजपा ने बलीराम कश्यप के बेटे दिनेश कश्यप को लोकसभा उपचुनाव में उम्मीदवार बनाकर साबित कर दिया...कि वो बस्तर में किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहती...

सोमवार, 21 जून 2010

ये अकड़ कहीं अकड़ा न दे...

बिहार में एक तो गठबंधन की सरकार... और उस पर नीतीश की ठसक... शायद नीतीश कुमार ये भूल गए हैं... कि अगर उन्होंने आज तक सत्ता का सुख भोगा है तो वो गठबंधन के जरिए ही... और जिस तरह से पिछले कुछ महीनों से उन्होंने जो रवैया अपनाया हुआ है... उसे देखकर तो यही लगता है कि वे कुछ ज्यादा ही जोश में है आगामी चुनाव को लेकर... लेकिन वे भूल गए हैं कि जब-जब भी उनके नाम के साथ मंत्री लगा है... चाहे वो रेल मंत्री बने या फिर मुख्यमंत्री... सब भाजपा की ही बदौलत... तो फिर आज ये तल्ख तेवर क्यों... और उन्हें अगर अपनी सेक्युलर छवि का इतना ही ख्याल है तो जब वे मुख्यमंत्री बने तब उन्हें ये ख्याल क्यों नहीं आया... क्या उस समय भाजपा सेक्यूलर नहीं थी... या नरेंद्र मोदी भाजपा में नहीं थे... चलो इसे भी जाने दो लेकिन लोकसभा चुनाव में चिल्ला-चिल्ला कर जिस तरह से आपने मोदीजी के बिहार आने पर रोक लगाई थी... तो फिर हफ्ते भर बाद ही लुधियाना में आपने मोदी के साथ हवा में हाथ क्यों लहराया... और अगर मोदी या गुजरात की जनता से या उनके पैसों में इतनी ही खोट है... तो फिर उस हाथ क्या करेंगे... जो नरेंद्र मोदी के साथ जनता के संबोधन में उठा था... इतना ही नहीं नीतीश जी ये भी गौर करने वाली बात है कि आप तो वैशाखी के जरिए सत्ता में है... लेकिन जिस नरेंद्र मोदी से आप हाय-तौबा कर रहें हैं तो उन्हें किसी के सहारे की जरूरत नहीं है...फिर भी वे आपको एक घटक दल समझकर इतना सम्मान दे रहें हैं... लेकिन आप हैं कि कभी उनका डिनर कैंसिल करते हैं... तो कभी राहत के लिए पहुंचाई हुई राशि लौटाते हैं... हालांकि ये आप भी जानते हैं कि राहत की राशि लौटाकर आप कोई तुर्रंम खां नहीं बन गए... बल्कि इसे एक बचकानी हरकत से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता... और अगर आपको सेक्यूलर बनने का इतना ही शौक है तो फिर भाजपा से किनारा करने में इतनी देर क्यों लगा रहे हैं... और क्यों बिहार की भोली-भाली जनता को धोखा दे रहे हैं...

भाजपा की हालत देखकर भी यही लगता है कि ये राष्ट्रीय पार्टी और मुख्य विपक्षी दल खुद गठबंधन के जरिए ही सत्ता का सुख भोगना चाहती है... शायद बीजेपी के नेताओं को याद हो कि उत्तरप्रदेश में उन्होंने मायावती को समर्थन देकर उन्हें सत्ता का स्वाद चखाया था... लेकिन जब भाजपा
की बारी आई तो बहनजी ने टाटा-बाय-बाय कर लिया... और भाजपा बेचारी मुंह ताकती रह गई... यही नहीं उत्तरप्रदेश में भाजपा का जो जनाधार था वो भी उसने खो दिया... झारखंड में भी भाजपा ने शिबू सोरेन के भ्रष्टाचार के जिस मुद्दे पर चुनाव लड़ा
उसी मुद्दे को त्यागकर गुरुजी को सत्ता का सुख देने के लिए तैयार हो गई... और जब खुद की बारी आई तो गुरुजी के दांव – पेचों को आप झेल नहीं सके... और मुंह की खानी पड़ी... खैर ये तो रही कल की बात... जो पुरानी हो गई... लेकिन अब बिहार में भी आपके सामने एक बार फिर से वही स्थिति है... अब न जाने आपको किस बात का इंतजार है... खैर अभी तो नीतीश ने आपका डिनर ही कैंसिल किया है... कहीं ऐसा न हो कि चुनाव के समय गठबंधन धरा-धरा रह जाए... और विकास की पूरी मलाई खाते हुए नीतीश इस बार खुद की दम पर सत्ता हथिया ले... और आपका बिहार में जो बचा-खुचा जनाधार है वो भी खो बैंठे... या फिर सेक्यूलर छवि का ठोंग रचने वाले नीतीश की असलीयत पहचान कर वहां कि जनता कहीं आपकी अकड़ा न दे...

महेश मेवाड़ा

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

कोई दिवाना कहता है

कोई दिवाना कहता है कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है
तू मुझसे दूर कैसी है मैं तुझसे दूर कैसा हूं
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है
मोहब्बत एक अहसासों की पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दिवाना था कभी मीरा दिवानी थी
यहां सब लोग कहते हैं मेरी आंखों में आसूं हैं
जो तू समझे तो मोती हैं जो ना समझे तो पानी हैं
समन्दर पीर का अन्दर है लेकिन रो नहीं सकता
ये आंसू प्यार का मोती है इसको खो नहीं सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता
भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का
मैं किस्से को हकीक़त में बदल बैठा तो हंगामा
डॉ कुमार विश्वास

'मौत का सौदागर'


मौत का सौदागर

जी हां इस वाक्य को सुनकर में हैरान रह गया था... जब कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने गुजरात दंगों को लेकर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को इस उपाधि से नवाजा था.... लेकिन अब शायद नरेंद्र मोदी की बारी थी... तभी तो उन्होंने पटना में आयोजित भाजपा की स्वाभिमान रैली में एक तीर से कई निशाने साधे... और मैडम सोनिया से पूछ ही डाला की भोपाल गैस त्रासदी में मारे गए हजारों लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है.... और किस तरह से इतनी मौत का दोषी वॉरेन एंडरसन को सरकारी दामाद बनाकर बचाया गया.... तो आखिर कौन हुआ मौत का सौदागर

भले ही नेता वोट के लिए आरोप प्रत्यारोप की राजनीति करे.... लेकिन एक बात तो साफ है कि चाहे वो गोधरा कांड हो.... या फिर भोपाल गैस त्रासदी.... दोनों ही जगह निर्दोष लोग ही काल के गाल में समाए.... और वे निर्दोष लोग ही सालों बाद भी मुंह बांए खड़े हैं कि हमारे अपनों की मौत का जिम्मेदार आखिर कौन है.... इस सवाल पर लाख दलीलों और गवाहों के बयान के बावजूद शायद हमारी न्याय व्यवस्था भी मौन है....

लेकिन एक बात तो साफ है कि जिस तरह से मौत का सौदागर शब्द भारत की राजनीति में चल पड़ा है.... अब ये शोध का विषय हो सकता है.... कि आखिर हमारे देश में कौन-कौन लोग ऐसे हैं जिन्हें इस उपाधी से नवाजा जा सकता है.... और जो वाकई में मौत के सौदागर हैं.... इस शब्द को भारतीय राजनीति में लाने का श्रेय भी कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को जाता है.... कि उन्होंने इस शब्द का मतलब जाने बिना ही... एक चुनावी सभा में नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कह डाला... या फिर उनका भाषण लिखने वाला वो शख्स जिसने बड़े ही उम्दा तरीके से सोनिया जी के भाषण में इस शब्द का प्रयोग किया... बहरहाल अक्सर यही होता है कि करता कोई है, नाम किसी और का होता है...