मंगलवार, 31 जनवरी 2012

फिर हारा माटीपुत्र


एक हाथ रोटी बेलता...
दूसरा रोटी खाता...
तीसरा रोटी से खेलता...
ये तीसरा है कौन इसपर संसद भी है मौन...

आज किसानों की हालत कुछ इसी तरह की है... क्या है किसान... कौन है किसान... इससे किसी को वास्ता नहीं... क्योंकि किसान एक ऐसा तबका है... जो फसल उत्पादन का मजदूर है... और उसके उत्पाद का मौल भी वो तैयार करते हैं... जिसका इसकी हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है... मुंशी प्रेमचंद्र के साहित्य गोदान में जो स्थिति धनिया किसान की थी... वो आज भी हमारे आधुनिक भारत के किसान की है... धनिया और उसका परिवार एक गौ यानी गाय के लिए किस तरीके से अपना सब-कुछ न्यौछावर कर देता है... लेकिन उसे छोड़ने को तैयार नहीं... कुछ यही हाल किसान का है... वो भले ही कर्ज के बोझ में दबकर मरने को तैयार हो जाता है... लेकिन अपनी माटी छोड़ने को तैयार नहीं है... और न ही उसे किसी दूसरे को देने के लिए... वाकई आज भले ही कर्ज में डूबकर रोजाना 47 किसान आत्महत्या कर रहे हों... हजारों किसान कुदरत की मार झेलने को मजबूर हैं... लेकिन उन्हें सुनने वाला कौन है... फसल किसान उगाता है... सरकार नहीं... लेकिन फिर भी सरकार के जिम्मेदार तय करते हैं कि फसल खराब हुई है... या नहीं... क्यों उन किसानों से मशविरा नहीं किया जाता कि वाकई उनके खून पसीने से सींची फसल की हकीकत क्या है... सबसे पहले हमे इस बात को समझने की जरूरत है कि किसान आखिर किस वजह से तंग आकर मौत को गले लगा लेता है... क्यों धरती का सीना चीरकर अन्न पैदा करने वाला माटीपुत्र हार जाता है...

महेश मेवाड़ा, पत्रकार

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