बिहार में एक तो गठबंधन की सरकार... और उस पर नीतीश की ठसक... शायद नीतीश कुमार ये भूल गए हैं... कि अगर उन्होंने आज तक सत्ता का सुख भोगा है तो वो गठबंधन के जरिए ही... और जिस तरह से पिछले कुछ महीनों से उन्होंने जो रवैया अपनाया हुआ है... उसे देखकर तो यही लगता है कि वे कुछ ज्यादा ही जोश में है आगामी चुनाव को लेकर... लेकिन वे भूल गए हैं कि जब-जब भी उनके नाम के साथ मंत्री लगा है... चाहे वो रेल मंत्री बने या फिर मुख्यमंत्री... सब भाजपा की ही बदौलत... तो फिर आज ये तल्ख तेवर क्यों... और उन्हें अगर अपनी सेक्युलर छवि का इतना ही ख्याल है तो जब वे मुख्यमंत्री बने तब उन्हें ये ख्याल क्यों नहीं आया... क्या उस समय भाजपा सेक्यूलर नहीं थी... या नरेंद्र मोदी भाजपा में नहीं थे... चलो इसे भी जाने दो लेकिन लोकसभा चुनाव में चिल्ला-चिल्ला कर जिस तरह से आपने मोदीजी के बिहार आने पर रोक लगाई थी... तो फिर हफ्ते भर बाद ही लुधियाना में आपने मोदी के साथ हवा में हाथ क्यों लहराया... और अगर मोदी या गुजरात की जनता से या उनके पैसों में इतनी ही खोट है... तो फिर उस हाथ क्या करेंगे... जो नरेंद्र मोदी के साथ जनता के संबोधन में उठा था... इतना ही नहीं नीतीश जी ये भी गौर करने वाली बात है कि आप तो वैशाखी के जरिए सत्ता में है... लेकिन जिस नरेंद्र मोदी से आप हाय-तौबा कर रहें हैं तो उन्हें किसी के सहारे की जरूरत नहीं है...फिर भी वे आपको एक घटक दल समझकर इतना सम्मान दे रहें हैं... लेकिन आप हैं कि कभी उनका डिनर कैंसिल करते हैं... तो कभी राहत के लिए पहुंचाई हुई राशि लौटाते हैं... हालांकि ये आप भी जानते हैं कि राहत की राशि लौटाकर आप कोई तुर्रंम खां नहीं बन गए... बल्कि इसे एक बचकानी हरकत से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता... और अगर आपको सेक्यूलर बनने का इतना ही शौक है तो फिर भाजपा से किनारा करने में इतनी देर क्यों लगा रहे हैं... और क्यों बिहार की भोली-भाली जनता को धोखा दे रहे हैं...
भाजपा की हालत देखकर भी यही लगता है कि ये राष्ट्रीय पार्टी और मुख्य विपक्षी दल खुद गठबंधन के जरिए ही सत्ता का सुख भोगना चाहती है... शायद बीजेपी के नेताओं को याद हो कि उत्तरप्रदेश में उन्होंने मायावती को समर्थन देकर उन्हें सत्ता का स्वाद चखाया था... लेकिन जब भाजपा
की बारी आई तो बहनजी ने टाटा-बाय-बाय कर लिया... और भाजपा बेचारी मुंह ताकती रह गई... यही नहीं उत्तरप्रदेश में भाजपा का जो जनाधार था वो भी उसने खो दिया... झारखंड में भी भाजपा ने शिबू सोरेन के भ्रष्टाचार के जिस मुद्दे पर चुनाव लड़ा
उसी मुद्दे को त्यागकर गुरुजी को सत्ता का सुख देने के लिए तैयार हो गई... और जब खुद की बारी आई तो गुरुजी के दांव – पेचों को आप झेल नहीं सके... और मुंह की खानी पड़ी... खैर ये तो रही कल की बात... जो पुरानी हो गई... लेकिन अब बिहार में भी आपके सामने एक बार फिर से वही स्थिति है... अब न जाने आपको किस बात का इंतजार है... खैर अभी तो नीतीश ने आपका डिनर ही कैंसिल किया है... कहीं ऐसा न हो कि चुनाव के समय गठबंधन धरा-धरा रह जाए... और विकास की पूरी मलाई खाते हुए नीतीश इस बार खुद की दम पर सत्ता हथिया ले... और आपका बिहार में जो बचा-खुचा जनाधार है वो भी खो बैंठे... या फिर सेक्यूलर छवि का ठोंग रचने वाले नीतीश की असलीयत पहचान कर वहां कि जनता कहीं आपकी अकड़ा न दे...
महेश मेवाड़ा
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