मंगलवार, 28 जुलाई 2009

कोई दिवाना कहता है

कोई दिवाना कहता है कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है
तू मुझसे दूर कैसी है मैं तुझसे दूर कैसा हूं
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है
मोहब्बत एक अहसासों की पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दिवाना था कभी मीरा दिवानी थी
यहां सब लोग कहते हैं मेरी आंखों में आसूं हैं
जो तू समझे तो मोती हैं जो ना समझे तो पानी हैं
समन्दर पीर का अन्दर है लेकिन रो नहीं सकता
ये आंसू प्यार का मोती है इसको खो नहीं सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता
भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का
मैं किस्से को हकीक़त में बदल बैठा तो हंगामा
डॉ कुमार विश्वास

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