सोमवार, 2 मई 2011

जागो नौजवानों....


हमारा देश इस समय सर्वाधिक युवा-देश है... भारत की जनगणना 2011 के अनन्तिम आकंड़ों के अनुसार देश की कुल जनसंख्या 1,21,01,93,422 है... इसमें करीब 55 फीसदी आबादी युवाओं की है... यानी देश की तकदीर और तस्वीर बदलने की जिम्मेदारी भी युवाओं के कंधो पर ही है... मैं मेवाड़ा, राजपूत, क्षत्रिय समाज की इस पत्रिका में इस बात का उल्लेख सिर्फ इस लिए कर रहा हूं...कि हमारे समाज में भी इस समय सबसे ज्यादा आबादी युवाओं की हैं.... और ये पीढ़ी ही हमारे समाज में फैली तमाम बुराईयों को दूर करने की कुब्बत रखती है... बस जरूरत है एक सशक्त मार्गदर्शन की... हमारे समाज में आज भी कई तरह की बुराईयां और कुरीतियां जड़ जमाएं हैं....जिनको दूर करने की बजाय हम खुद भी सामाजिक बंधन की आड़ में उन्हें चुप-चाप स्वीकार कर लेते हैं... छोटी उम्र में सगाई कर देना, पढ़ाई के प्रति संकुचित सोंच, लड़कियों को उच्च शिक्षा से दूर रखना, इतना ही नहीं आज भी हमारे समाज में बाल विवाह धड़ल्ले से हो रहे हैं... जिन्हें हमारे समाज के जिम्मेदार लोग ही बढ़ावा देते हैं... इतना ही नहीं कम उम्र में शादी होने के बाद कई संबंध बिगड़ जाते हैं...या फिर सामाजिक दबाव के चलते कई लोग ताउम्र उन्हें ढोते रहते हैं... और जो संबंध खराब हो जाते हैं उसमें झगड़ा देने की प्रथा है... जिसे न देनें पर कई तरह के उपद्रव मचाए जाते हैं... हम एक लोकतंत्र देश में रहते हैं... और ये ऐसी बुराईयां हैं जो हमारे समाज को एक छोटी मानसिकता की तरफ धकेलती हैं... और जिन्हें दूर करने की जरूरत आज हमारे समाज को और खासकर युवा वर्ग को है... मैं जानता हूं कि हमारे समाज का मुख्य व्यवसाय कृषि है... और हमें किसान या किसान पुत्र कहलाने से भी गुरेज नहीं करना चाहिए.... मैं ये भी जानता हूं कि युवाओं का मन चंचल होता है.....लेकिन मैं समाज के उन अनुभवी और वुद्धिजीवी लोगों से गुजारिश करना चाहूंगा कि वो अपने अनुभव और युवा सोच के सहारे ऐसे कठोर कदम उठाए... जिससे हमारे समाज की तस्वीर बदले... और हम सदियों से चली आ रही कुरीतियों के बंधनों से आजाद हो जाएं...जिनकी वजह से हमें खुद अपनी ही नजरों में गिरना पड़ता है... ऐसा भी नहीं कि हमारे समाज के युवा उन परंपराओं से भागते हों जो समाज को सम्मान दिलाती है.... ताजा उदाहरण है ग्राम देहरिया कला का जो कि भोपाल जिले में आता है... वहां के हमारे 22 बर्षीय युवा साथी बह्म मेवाड़ा ने अपने गांव में बर्षों से चली आ रही पटेल परंपरा को मुस्कुराते हुए स्वीकार किया... और आज गांव का पटेल होने के साथ-साथ समाज की तमाम बुराईयों को दूर करने में जुटा है... साथ ही वो युवाओं के लिए एक प्रेरणा बनकर भी उभरा हैं... ऐसा नहीं कि केवल परंपरा तक ही हमारे मेवाड़ा समाज के युवा सिमटे हैं... इससे इतर भी हमारे समाज के युवा शिक्षा, संस्कृति, राजनीति, और पत्रकारिता में भी समाज का नाम रोशन करने में जुटे हैं... सीहोर से नगर पालिका अध्यक्ष बनकर युवा साथी नरेश मेवाड़ा ने समाज के युवाओं को राजनीति में आने की प्रेरणा दी है.... फंदा के जिला पंचायत सदस्य राजू मेवाड़ा और यहीं के प्रमोद मेवाड़ा जनपद सदस्य बनकर इलाके के विकास में अपना योगदान दे रहें हैं.....साथ ही हमारे खजूरी के दिनेश मेवाड़ा और ढाबला के ज्ञानसिंह मेवाड़ा कम उम्र में सरपंच बनकर अपने गांव के विकास का जिम्मा उठाया है... बिलकिसगंज के विक्रम मेंवाड़ा टीलाखेड़ी में स्कूल संचालित करके समाज में ज्ञान की अलख जगा रहे हैं... और उनके स्कूल में पढ़े मैधावी छात्र प्रदेश ही नहीं देश में भी अपना और अपने परिवार का नाम रोशन कर रहे हैं.... हमारे समाज के युवा केवल शिक्षक, कर्मचारी और राजनीतिज्ञ ही नहीं बन रहे... बल्कि डॉक्टर, इंजीनियर और पत्रकार बनकर समाज को एक नई दिशा देने में जुटे हैं... इनके साथ-साथ हमारे पढ़े-लिखे नौजवान युवा साथी ढाबला के सुरेंद्र मेवाड़ा, केदार मेवाड़ा, बिलकिसगंज के नरेश मेवाड़ा, सुरेश मेवाड़ा, गजराज मेवाड़ा, प्रीतम मेवाड़ा, भारत मेवाड़ा, रामबाबू मेवाड़ा, अर्जुन मेवाड़ा रलाबती के राजेश मेवाड़ा, विक्रम मेवाड़ा, थूनां के राजेश मेवाड़ा, प्रह्लाद मेवाड़ा, दुपाड़िया दांगी के गिरवर मेवाड़ा, प्रह्लाद मेवाड़ा, देहरिया कला के राकेश मेवाड़ा, शादीलाल मेवाड़ा, नरेंद्र मेवाड़ा, अनार सिंह मेवाड़ा, ब्रिजिशनगर के प्रेमसिंह मेवाड़ा, राजेश मेवाड़ा ऐसे कई हमारे युवा साथी हैं.... जो समासेवी बनकर समाज में अलख जगाने के काम में जुटे हैं... इतना सब कुछ होने के बाद भी हमारे समाज में आज भी ये कुरीतियां डेरा डाले क्यों बैठी हैं... अब इन्हें जड़ से उखाड़ फेंकने का समय आ गया है.... और हम युवाओं को बिलकुल भी देर नहीं करते हुए अब जुट जाने की जरूरत है.... क्योंकि अब नहीं जागे तो हम कभी नहीं जाग पाएंगे... इसलिए अपने युवा साथियों से इतना ही कहना चाहूंगा... कि कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं होता... तबीयत से एक पत्थर तो उछालो यारों...

धन्यवाद
आपका अपना
महेश मेवाड़ा, पत्रकार
रायपुर (छत्तीसगढ़)

बस्तर की बाजी


बस्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी के तौर पर जाना जाता है... यहां का दशहरा देश ही नहीं विदेशों में भी विख्यात है... लेकिन नक्सली हिंसा की वजह से बस्तर अपनी रंगत खोता जा रहा है... सांसद बलीराम कश्यप के निधन के बाद बस्तर एक बार फिर लोकसभा उपचुनाव को लेकर सुर्खियों में है... बस्तर लोकसभा में चार जिले बीजापुर, नारायणपुर, दंतेवाड़ा और बस्तर आते हैं... जिनमें आठ विधानसभा कोंटा, बीजापुर, दंतेवाड़ा, जगदलपुर, बस्तर, चित्रकूट, नारायणपुर और कोंटागांव के मतदाता मतदान करते हैं.. ये पूरे इलाके धुर नक्सली माने जाते हैं... सबसे खास बात ये कि इन आठ विधानसभा में से सात सीटों पर भाजपा का कब्जा है... वहीं एक सीट कोंटा से कांग्रेस के प्रत्याशी कवासी लखमा ने जीत हासिल की थी...बस्तर लोकसभा के लिए हो रहे उपचुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही माना जा रहा है... भाजपा ने जहां बस्तर में सहानुभुती वोट बटोरने के लिए बलीराम कश्यप के बेटे दिनेश कश्यप पर भरोसा जताया है... दिनेश कश्यप वर्तमान में केंद्रीय सहकारी बैंक के अध्यक्ष हैं... और उनके छोटे भाई केदार कश्यप रमन सरकार में मंत्री हैं... वहीं प्रदेश कांग्रेस की गुटबाजी में इस बार जोगी खेमा बाजी मार ले गया... और विधायक कवासी लखमा पर कांग्रेस ने दाव लगाया है.... कवासी लखमा कोंटा विधानसभा क्षेत्र का तीन बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं... और वर्तमान में वे वहां से विधायक हैं... आम चुनाव की बात करें तो साल 1998 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मानकूराम सोढ़ी को हराकर बलीराम कश्यप पहली बार सांसद बने.. उन्होंने साल 1999 और 2004 में कांग्रेस प्रत्याशी महेंद्र कर्मा को मात दी...जिसके बाद साल 2009 के आम चुनाव में भी भाजपा ने बस्तर टाइगर बलीराम कश्यप पर ही भरोसा जताया... और उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार शंकर सोढ़ी और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के मनीष कुंजाम को हराकर जीत हासिल की... इस लिहाज से भाजपा ने बलीराम कश्यप के बेटे दिनेश कश्यप को लोकसभा उपचुनाव में उम्मीदवार बनाकर साबित कर दिया...कि वो बस्तर में किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहती...

सोमवार, 21 जून 2010

ये अकड़ कहीं अकड़ा न दे...

बिहार में एक तो गठबंधन की सरकार... और उस पर नीतीश की ठसक... शायद नीतीश कुमार ये भूल गए हैं... कि अगर उन्होंने आज तक सत्ता का सुख भोगा है तो वो गठबंधन के जरिए ही... और जिस तरह से पिछले कुछ महीनों से उन्होंने जो रवैया अपनाया हुआ है... उसे देखकर तो यही लगता है कि वे कुछ ज्यादा ही जोश में है आगामी चुनाव को लेकर... लेकिन वे भूल गए हैं कि जब-जब भी उनके नाम के साथ मंत्री लगा है... चाहे वो रेल मंत्री बने या फिर मुख्यमंत्री... सब भाजपा की ही बदौलत... तो फिर आज ये तल्ख तेवर क्यों... और उन्हें अगर अपनी सेक्युलर छवि का इतना ही ख्याल है तो जब वे मुख्यमंत्री बने तब उन्हें ये ख्याल क्यों नहीं आया... क्या उस समय भाजपा सेक्यूलर नहीं थी... या नरेंद्र मोदी भाजपा में नहीं थे... चलो इसे भी जाने दो लेकिन लोकसभा चुनाव में चिल्ला-चिल्ला कर जिस तरह से आपने मोदीजी के बिहार आने पर रोक लगाई थी... तो फिर हफ्ते भर बाद ही लुधियाना में आपने मोदी के साथ हवा में हाथ क्यों लहराया... और अगर मोदी या गुजरात की जनता से या उनके पैसों में इतनी ही खोट है... तो फिर उस हाथ क्या करेंगे... जो नरेंद्र मोदी के साथ जनता के संबोधन में उठा था... इतना ही नहीं नीतीश जी ये भी गौर करने वाली बात है कि आप तो वैशाखी के जरिए सत्ता में है... लेकिन जिस नरेंद्र मोदी से आप हाय-तौबा कर रहें हैं तो उन्हें किसी के सहारे की जरूरत नहीं है...फिर भी वे आपको एक घटक दल समझकर इतना सम्मान दे रहें हैं... लेकिन आप हैं कि कभी उनका डिनर कैंसिल करते हैं... तो कभी राहत के लिए पहुंचाई हुई राशि लौटाते हैं... हालांकि ये आप भी जानते हैं कि राहत की राशि लौटाकर आप कोई तुर्रंम खां नहीं बन गए... बल्कि इसे एक बचकानी हरकत से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता... और अगर आपको सेक्यूलर बनने का इतना ही शौक है तो फिर भाजपा से किनारा करने में इतनी देर क्यों लगा रहे हैं... और क्यों बिहार की भोली-भाली जनता को धोखा दे रहे हैं...

भाजपा की हालत देखकर भी यही लगता है कि ये राष्ट्रीय पार्टी और मुख्य विपक्षी दल खुद गठबंधन के जरिए ही सत्ता का सुख भोगना चाहती है... शायद बीजेपी के नेताओं को याद हो कि उत्तरप्रदेश में उन्होंने मायावती को समर्थन देकर उन्हें सत्ता का स्वाद चखाया था... लेकिन जब भाजपा
की बारी आई तो बहनजी ने टाटा-बाय-बाय कर लिया... और भाजपा बेचारी मुंह ताकती रह गई... यही नहीं उत्तरप्रदेश में भाजपा का जो जनाधार था वो भी उसने खो दिया... झारखंड में भी भाजपा ने शिबू सोरेन के भ्रष्टाचार के जिस मुद्दे पर चुनाव लड़ा
उसी मुद्दे को त्यागकर गुरुजी को सत्ता का सुख देने के लिए तैयार हो गई... और जब खुद की बारी आई तो गुरुजी के दांव – पेचों को आप झेल नहीं सके... और मुंह की खानी पड़ी... खैर ये तो रही कल की बात... जो पुरानी हो गई... लेकिन अब बिहार में भी आपके सामने एक बार फिर से वही स्थिति है... अब न जाने आपको किस बात का इंतजार है... खैर अभी तो नीतीश ने आपका डिनर ही कैंसिल किया है... कहीं ऐसा न हो कि चुनाव के समय गठबंधन धरा-धरा रह जाए... और विकास की पूरी मलाई खाते हुए नीतीश इस बार खुद की दम पर सत्ता हथिया ले... और आपका बिहार में जो बचा-खुचा जनाधार है वो भी खो बैंठे... या फिर सेक्यूलर छवि का ठोंग रचने वाले नीतीश की असलीयत पहचान कर वहां कि जनता कहीं आपकी अकड़ा न दे...

महेश मेवाड़ा

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

कोई दिवाना कहता है

कोई दिवाना कहता है कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है
तू मुझसे दूर कैसी है मैं तुझसे दूर कैसा हूं
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है
मोहब्बत एक अहसासों की पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दिवाना था कभी मीरा दिवानी थी
यहां सब लोग कहते हैं मेरी आंखों में आसूं हैं
जो तू समझे तो मोती हैं जो ना समझे तो पानी हैं
समन्दर पीर का अन्दर है लेकिन रो नहीं सकता
ये आंसू प्यार का मोती है इसको खो नहीं सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता
भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का
मैं किस्से को हकीक़त में बदल बैठा तो हंगामा
डॉ कुमार विश्वास

'मौत का सौदागर'


मौत का सौदागर

जी हां इस वाक्य को सुनकर में हैरान रह गया था... जब कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने गुजरात दंगों को लेकर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को इस उपाधि से नवाजा था.... लेकिन अब शायद नरेंद्र मोदी की बारी थी... तभी तो उन्होंने पटना में आयोजित भाजपा की स्वाभिमान रैली में एक तीर से कई निशाने साधे... और मैडम सोनिया से पूछ ही डाला की भोपाल गैस त्रासदी में मारे गए हजारों लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है.... और किस तरह से इतनी मौत का दोषी वॉरेन एंडरसन को सरकारी दामाद बनाकर बचाया गया.... तो आखिर कौन हुआ मौत का सौदागर

भले ही नेता वोट के लिए आरोप प्रत्यारोप की राजनीति करे.... लेकिन एक बात तो साफ है कि चाहे वो गोधरा कांड हो.... या फिर भोपाल गैस त्रासदी.... दोनों ही जगह निर्दोष लोग ही काल के गाल में समाए.... और वे निर्दोष लोग ही सालों बाद भी मुंह बांए खड़े हैं कि हमारे अपनों की मौत का जिम्मेदार आखिर कौन है.... इस सवाल पर लाख दलीलों और गवाहों के बयान के बावजूद शायद हमारी न्याय व्यवस्था भी मौन है....

लेकिन एक बात तो साफ है कि जिस तरह से मौत का सौदागर शब्द भारत की राजनीति में चल पड़ा है.... अब ये शोध का विषय हो सकता है.... कि आखिर हमारे देश में कौन-कौन लोग ऐसे हैं जिन्हें इस उपाधी से नवाजा जा सकता है.... और जो वाकई में मौत के सौदागर हैं.... इस शब्द को भारतीय राजनीति में लाने का श्रेय भी कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को जाता है.... कि उन्होंने इस शब्द का मतलब जाने बिना ही... एक चुनावी सभा में नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कह डाला... या फिर उनका भाषण लिखने वाला वो शख्स जिसने बड़े ही उम्दा तरीके से सोनिया जी के भाषण में इस शब्द का प्रयोग किया... बहरहाल अक्सर यही होता है कि करता कोई है, नाम किसी और का होता है...