सोमवार, 21 जून 2010

ये अकड़ कहीं अकड़ा न दे...

बिहार में एक तो गठबंधन की सरकार... और उस पर नीतीश की ठसक... शायद नीतीश कुमार ये भूल गए हैं... कि अगर उन्होंने आज तक सत्ता का सुख भोगा है तो वो गठबंधन के जरिए ही... और जिस तरह से पिछले कुछ महीनों से उन्होंने जो रवैया अपनाया हुआ है... उसे देखकर तो यही लगता है कि वे कुछ ज्यादा ही जोश में है आगामी चुनाव को लेकर... लेकिन वे भूल गए हैं कि जब-जब भी उनके नाम के साथ मंत्री लगा है... चाहे वो रेल मंत्री बने या फिर मुख्यमंत्री... सब भाजपा की ही बदौलत... तो फिर आज ये तल्ख तेवर क्यों... और उन्हें अगर अपनी सेक्युलर छवि का इतना ही ख्याल है तो जब वे मुख्यमंत्री बने तब उन्हें ये ख्याल क्यों नहीं आया... क्या उस समय भाजपा सेक्यूलर नहीं थी... या नरेंद्र मोदी भाजपा में नहीं थे... चलो इसे भी जाने दो लेकिन लोकसभा चुनाव में चिल्ला-चिल्ला कर जिस तरह से आपने मोदीजी के बिहार आने पर रोक लगाई थी... तो फिर हफ्ते भर बाद ही लुधियाना में आपने मोदी के साथ हवा में हाथ क्यों लहराया... और अगर मोदी या गुजरात की जनता से या उनके पैसों में इतनी ही खोट है... तो फिर उस हाथ क्या करेंगे... जो नरेंद्र मोदी के साथ जनता के संबोधन में उठा था... इतना ही नहीं नीतीश जी ये भी गौर करने वाली बात है कि आप तो वैशाखी के जरिए सत्ता में है... लेकिन जिस नरेंद्र मोदी से आप हाय-तौबा कर रहें हैं तो उन्हें किसी के सहारे की जरूरत नहीं है...फिर भी वे आपको एक घटक दल समझकर इतना सम्मान दे रहें हैं... लेकिन आप हैं कि कभी उनका डिनर कैंसिल करते हैं... तो कभी राहत के लिए पहुंचाई हुई राशि लौटाते हैं... हालांकि ये आप भी जानते हैं कि राहत की राशि लौटाकर आप कोई तुर्रंम खां नहीं बन गए... बल्कि इसे एक बचकानी हरकत से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता... और अगर आपको सेक्यूलर बनने का इतना ही शौक है तो फिर भाजपा से किनारा करने में इतनी देर क्यों लगा रहे हैं... और क्यों बिहार की भोली-भाली जनता को धोखा दे रहे हैं...

भाजपा की हालत देखकर भी यही लगता है कि ये राष्ट्रीय पार्टी और मुख्य विपक्षी दल खुद गठबंधन के जरिए ही सत्ता का सुख भोगना चाहती है... शायद बीजेपी के नेताओं को याद हो कि उत्तरप्रदेश में उन्होंने मायावती को समर्थन देकर उन्हें सत्ता का स्वाद चखाया था... लेकिन जब भाजपा
की बारी आई तो बहनजी ने टाटा-बाय-बाय कर लिया... और भाजपा बेचारी मुंह ताकती रह गई... यही नहीं उत्तरप्रदेश में भाजपा का जो जनाधार था वो भी उसने खो दिया... झारखंड में भी भाजपा ने शिबू सोरेन के भ्रष्टाचार के जिस मुद्दे पर चुनाव लड़ा
उसी मुद्दे को त्यागकर गुरुजी को सत्ता का सुख देने के लिए तैयार हो गई... और जब खुद की बारी आई तो गुरुजी के दांव – पेचों को आप झेल नहीं सके... और मुंह की खानी पड़ी... खैर ये तो रही कल की बात... जो पुरानी हो गई... लेकिन अब बिहार में भी आपके सामने एक बार फिर से वही स्थिति है... अब न जाने आपको किस बात का इंतजार है... खैर अभी तो नीतीश ने आपका डिनर ही कैंसिल किया है... कहीं ऐसा न हो कि चुनाव के समय गठबंधन धरा-धरा रह जाए... और विकास की पूरी मलाई खाते हुए नीतीश इस बार खुद की दम पर सत्ता हथिया ले... और आपका बिहार में जो बचा-खुचा जनाधार है वो भी खो बैंठे... या फिर सेक्यूलर छवि का ठोंग रचने वाले नीतीश की असलीयत पहचान कर वहां कि जनता कहीं आपकी अकड़ा न दे...

महेश मेवाड़ा

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

कोई दिवाना कहता है

कोई दिवाना कहता है कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है
तू मुझसे दूर कैसी है मैं तुझसे दूर कैसा हूं
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है
मोहब्बत एक अहसासों की पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दिवाना था कभी मीरा दिवानी थी
यहां सब लोग कहते हैं मेरी आंखों में आसूं हैं
जो तू समझे तो मोती हैं जो ना समझे तो पानी हैं
समन्दर पीर का अन्दर है लेकिन रो नहीं सकता
ये आंसू प्यार का मोती है इसको खो नहीं सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता
भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का
मैं किस्से को हकीक़त में बदल बैठा तो हंगामा
डॉ कुमार विश्वास

'मौत का सौदागर'


मौत का सौदागर

जी हां इस वाक्य को सुनकर में हैरान रह गया था... जब कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने गुजरात दंगों को लेकर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को इस उपाधि से नवाजा था.... लेकिन अब शायद नरेंद्र मोदी की बारी थी... तभी तो उन्होंने पटना में आयोजित भाजपा की स्वाभिमान रैली में एक तीर से कई निशाने साधे... और मैडम सोनिया से पूछ ही डाला की भोपाल गैस त्रासदी में मारे गए हजारों लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है.... और किस तरह से इतनी मौत का दोषी वॉरेन एंडरसन को सरकारी दामाद बनाकर बचाया गया.... तो आखिर कौन हुआ मौत का सौदागर

भले ही नेता वोट के लिए आरोप प्रत्यारोप की राजनीति करे.... लेकिन एक बात तो साफ है कि चाहे वो गोधरा कांड हो.... या फिर भोपाल गैस त्रासदी.... दोनों ही जगह निर्दोष लोग ही काल के गाल में समाए.... और वे निर्दोष लोग ही सालों बाद भी मुंह बांए खड़े हैं कि हमारे अपनों की मौत का जिम्मेदार आखिर कौन है.... इस सवाल पर लाख दलीलों और गवाहों के बयान के बावजूद शायद हमारी न्याय व्यवस्था भी मौन है....

लेकिन एक बात तो साफ है कि जिस तरह से मौत का सौदागर शब्द भारत की राजनीति में चल पड़ा है.... अब ये शोध का विषय हो सकता है.... कि आखिर हमारे देश में कौन-कौन लोग ऐसे हैं जिन्हें इस उपाधी से नवाजा जा सकता है.... और जो वाकई में मौत के सौदागर हैं.... इस शब्द को भारतीय राजनीति में लाने का श्रेय भी कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को जाता है.... कि उन्होंने इस शब्द का मतलब जाने बिना ही... एक चुनावी सभा में नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कह डाला... या फिर उनका भाषण लिखने वाला वो शख्स जिसने बड़े ही उम्दा तरीके से सोनिया जी के भाषण में इस शब्द का प्रयोग किया... बहरहाल अक्सर यही होता है कि करता कोई है, नाम किसी और का होता है...