बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

फनकार की आपबीती


इंसान के अंदर छिपी प्रतिभा आखिर क्यों दब जाती है। और क्यों ये मतलब परस्त दुनिया एक काबिल इंसान को निराशा के गहरे समंदर में डुबोकर मार देती है। एक फनकार की कहानी सुनकर कुछ ऐसा ही लगा कि मानो जैसे उसने इस मतलबी दुनिया को समझने में भूल की। "मिट नहीं सकता कभी लिखा हुआ तकदीर का"...... संसार फिल्म के इस गीत को वृद्धाश्रम में गुमनामी की जिंदगी बसर कर रहे दिवाकर जोशी ने जब लिखा होगा। तब सोचा भी नहीं होगा कि उनको ऐसे हालातों से गुजरना पड़ेगा। दिवाकर का अतीत जानकर कोई भी हैरत में पड़ जाए कि क्या वाकई किस्मत इतनी करवट बदलती है। उदार प्रवृत्ति के जोशी ने विनोवा भावे की अपील पर बचपन में ही अपने हिस्से की जमीन देश को समर्पित कर दी। और निकल पड़े दुनिया की खाक छानने। बचपन से ही दिवाकर जोशी को गीत-कहानी लिखने का बड़ा शौक था। और यही रूची उन्हें खींचकर मुंबई की गलियों में ले गई। जहां इस फनकार ने राजकपूर की फिल्म आग समेत कई मशहूर गीत और कहानियां लिखी। जिन्हें मोहम्मद रफी और मुकेश जैसे गायकों ने अपनी आवाज से तराशा। राजकपूर की फिल्म आग का गीत "जिंदा हुं इस तरह कि गमे जिंदगी नहीं".... गीत को भी इसी फनकार ने लिखा था। लेकिन इस फनकार की लेखनी के सहारे बुलंदियां हासिल करने वाले फिल्मकारों और मतलब परस्तों ने ही उन्हें बेसहारा छोड़ दिया। अपने साथ हुए इस धोखे से आहत जोशी मुंबई को अलविदा कहकर घर लौट आए। इसके बाद उन्होंने राजनीति का भी रुख किया। और वहां भी उन्होंने अपना लोहा मनवाया। लेकिन यहां भी उन्हें धोखे के सिवा कुछ नहीं मिला। धोखे और अपनों की बेवफाई के बाद जोशी को दर-दर की ठोकरें भी खानी पड़ी। कई दिनों तक उन्हें भूखा रहना पड़ा। और वे बेसहारा यहां-वहां भटकते रहे। आखिर में वे पहुंचे भोपाल के एक वृद्धाश्रम में जहां गैरों से मिला अपनापन और वे वहीं के होकर रह गए। शोहरत और मुकाम के सच्चे हकदार इस फनकार को लोगों ने तो धोखा दिया ही साथ ही किस्मत ने भी इनके साथ खूब आंख-मिचौली खेली और वे गुमनामी के अंधेरों में खोते चले गए। बहरहाल एक बार फिर उन्हें सहारा मिला। और कवि के रूप में फिर से दिवाकर ने जादू बिखेरना शुरू कर दिया। इस तरह एक फनकार ने दुनिया से लड़कर खुद को जिंदा रखा।

रविवार, 5 फ़रवरी 2012

खामोशी...



मेरी खामोशी को तुम, क्यों समझ नहीं पाती हो...
जर्रे-जर्रे में तेरी खुशबू है, फिर मुझकों क्यों नहीं महकाती हो...
दिन-रात तेरी इबादत करता हूं, पर न जाने क्यों डरता हूं...
एक दिन तू मेरा बन जाएगा, ये उम्मीद मैं तुझसे करता हूं...
पर न जाने क्यों मैं डरता हूं, पर न जाने क्यों मैं डरता हूं....

साथ मिले गर तेरा मुझको, तो मैं दुनिया से लड़ जांऊगा...
हर पथ पर चलके साथ तेरे, मैं कुछ ऐसा कर जाऊंगा...
क्यों समझ कर भी तू मुझसे, अनजान बनी रहती है...
खामोशी को पहचानेगी तू, ये उम्मीद में तुझसे करता हूं...
पर न जाने क्यों मैं डरता हूं, पर न जाने क्यों मैं डरता हूं...


क्या डर है तुझको दुनिया का, एक बार बता दे मुझको...
या फिर मैं समझू की, तू है बस एक सुंदर सपना...
जो हर रात मुझे महकाता है, सुबह होते उड़ जाता है...
फिर भी तुझमें कुछ बात है साकी, क्यों मैं तुझसे उम्मीद करता हूं...
पर न जाने क्यों मैं डरता हूं, पर न जाने क्यों मैं डरता हूं...

महेश मेवाड़ा, पत्रकार

अग्निपथ....


वृक्ष हों भले खड़े,

हों घने हों बड़े,

एक पत्र छांह भी,

मांग मत, मांग मत, मांग मत,

अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ


तू न थकेगा कभी,

तू न रुकेगा कभी,

तू न मुड़ेगा कभी,

कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,

अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ


यह महान दृश्य है,

चल रहा मनुष्य है,

अश्रु श्वेत रक्त से,

लथपथ लथपथ लथपथ,

अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

हरिवंश राय बच्चन

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

कारवां गुजर गया...


स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क़ बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँ-धुआँ पहन गये,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ जमीन और आसमां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,
वक्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरण-चरण,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
ग़ाज एक वह गिरी,
पुंछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी,
और हम अजान से,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

गोपालदास "नीरज"

फिर हारा माटीपुत्र


एक हाथ रोटी बेलता...
दूसरा रोटी खाता...
तीसरा रोटी से खेलता...
ये तीसरा है कौन इसपर संसद भी है मौन...

आज किसानों की हालत कुछ इसी तरह की है... क्या है किसान... कौन है किसान... इससे किसी को वास्ता नहीं... क्योंकि किसान एक ऐसा तबका है... जो फसल उत्पादन का मजदूर है... और उसके उत्पाद का मौल भी वो तैयार करते हैं... जिसका इसकी हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है... मुंशी प्रेमचंद्र के साहित्य गोदान में जो स्थिति धनिया किसान की थी... वो आज भी हमारे आधुनिक भारत के किसान की है... धनिया और उसका परिवार एक गौ यानी गाय के लिए किस तरीके से अपना सब-कुछ न्यौछावर कर देता है... लेकिन उसे छोड़ने को तैयार नहीं... कुछ यही हाल किसान का है... वो भले ही कर्ज के बोझ में दबकर मरने को तैयार हो जाता है... लेकिन अपनी माटी छोड़ने को तैयार नहीं है... और न ही उसे किसी दूसरे को देने के लिए... वाकई आज भले ही कर्ज में डूबकर रोजाना 47 किसान आत्महत्या कर रहे हों... हजारों किसान कुदरत की मार झेलने को मजबूर हैं... लेकिन उन्हें सुनने वाला कौन है... फसल किसान उगाता है... सरकार नहीं... लेकिन फिर भी सरकार के जिम्मेदार तय करते हैं कि फसल खराब हुई है... या नहीं... क्यों उन किसानों से मशविरा नहीं किया जाता कि वाकई उनके खून पसीने से सींची फसल की हकीकत क्या है... सबसे पहले हमे इस बात को समझने की जरूरत है कि किसान आखिर किस वजह से तंग आकर मौत को गले लगा लेता है... क्यों धरती का सीना चीरकर अन्न पैदा करने वाला माटीपुत्र हार जाता है...

महेश मेवाड़ा, पत्रकार

सोमवार, 2 मई 2011

जागो नौजवानों....


हमारा देश इस समय सर्वाधिक युवा-देश है... भारत की जनगणना 2011 के अनन्तिम आकंड़ों के अनुसार देश की कुल जनसंख्या 1,21,01,93,422 है... इसमें करीब 55 फीसदी आबादी युवाओं की है... यानी देश की तकदीर और तस्वीर बदलने की जिम्मेदारी भी युवाओं के कंधो पर ही है... मैं मेवाड़ा, राजपूत, क्षत्रिय समाज की इस पत्रिका में इस बात का उल्लेख सिर्फ इस लिए कर रहा हूं...कि हमारे समाज में भी इस समय सबसे ज्यादा आबादी युवाओं की हैं.... और ये पीढ़ी ही हमारे समाज में फैली तमाम बुराईयों को दूर करने की कुब्बत रखती है... बस जरूरत है एक सशक्त मार्गदर्शन की... हमारे समाज में आज भी कई तरह की बुराईयां और कुरीतियां जड़ जमाएं हैं....जिनको दूर करने की बजाय हम खुद भी सामाजिक बंधन की आड़ में उन्हें चुप-चाप स्वीकार कर लेते हैं... छोटी उम्र में सगाई कर देना, पढ़ाई के प्रति संकुचित सोंच, लड़कियों को उच्च शिक्षा से दूर रखना, इतना ही नहीं आज भी हमारे समाज में बाल विवाह धड़ल्ले से हो रहे हैं... जिन्हें हमारे समाज के जिम्मेदार लोग ही बढ़ावा देते हैं... इतना ही नहीं कम उम्र में शादी होने के बाद कई संबंध बिगड़ जाते हैं...या फिर सामाजिक दबाव के चलते कई लोग ताउम्र उन्हें ढोते रहते हैं... और जो संबंध खराब हो जाते हैं उसमें झगड़ा देने की प्रथा है... जिसे न देनें पर कई तरह के उपद्रव मचाए जाते हैं... हम एक लोकतंत्र देश में रहते हैं... और ये ऐसी बुराईयां हैं जो हमारे समाज को एक छोटी मानसिकता की तरफ धकेलती हैं... और जिन्हें दूर करने की जरूरत आज हमारे समाज को और खासकर युवा वर्ग को है... मैं जानता हूं कि हमारे समाज का मुख्य व्यवसाय कृषि है... और हमें किसान या किसान पुत्र कहलाने से भी गुरेज नहीं करना चाहिए.... मैं ये भी जानता हूं कि युवाओं का मन चंचल होता है.....लेकिन मैं समाज के उन अनुभवी और वुद्धिजीवी लोगों से गुजारिश करना चाहूंगा कि वो अपने अनुभव और युवा सोच के सहारे ऐसे कठोर कदम उठाए... जिससे हमारे समाज की तस्वीर बदले... और हम सदियों से चली आ रही कुरीतियों के बंधनों से आजाद हो जाएं...जिनकी वजह से हमें खुद अपनी ही नजरों में गिरना पड़ता है... ऐसा भी नहीं कि हमारे समाज के युवा उन परंपराओं से भागते हों जो समाज को सम्मान दिलाती है.... ताजा उदाहरण है ग्राम देहरिया कला का जो कि भोपाल जिले में आता है... वहां के हमारे 22 बर्षीय युवा साथी बह्म मेवाड़ा ने अपने गांव में बर्षों से चली आ रही पटेल परंपरा को मुस्कुराते हुए स्वीकार किया... और आज गांव का पटेल होने के साथ-साथ समाज की तमाम बुराईयों को दूर करने में जुटा है... साथ ही वो युवाओं के लिए एक प्रेरणा बनकर भी उभरा हैं... ऐसा नहीं कि केवल परंपरा तक ही हमारे मेवाड़ा समाज के युवा सिमटे हैं... इससे इतर भी हमारे समाज के युवा शिक्षा, संस्कृति, राजनीति, और पत्रकारिता में भी समाज का नाम रोशन करने में जुटे हैं... सीहोर से नगर पालिका अध्यक्ष बनकर युवा साथी नरेश मेवाड़ा ने समाज के युवाओं को राजनीति में आने की प्रेरणा दी है.... फंदा के जिला पंचायत सदस्य राजू मेवाड़ा और यहीं के प्रमोद मेवाड़ा जनपद सदस्य बनकर इलाके के विकास में अपना योगदान दे रहें हैं.....साथ ही हमारे खजूरी के दिनेश मेवाड़ा और ढाबला के ज्ञानसिंह मेवाड़ा कम उम्र में सरपंच बनकर अपने गांव के विकास का जिम्मा उठाया है... बिलकिसगंज के विक्रम मेंवाड़ा टीलाखेड़ी में स्कूल संचालित करके समाज में ज्ञान की अलख जगा रहे हैं... और उनके स्कूल में पढ़े मैधावी छात्र प्रदेश ही नहीं देश में भी अपना और अपने परिवार का नाम रोशन कर रहे हैं.... हमारे समाज के युवा केवल शिक्षक, कर्मचारी और राजनीतिज्ञ ही नहीं बन रहे... बल्कि डॉक्टर, इंजीनियर और पत्रकार बनकर समाज को एक नई दिशा देने में जुटे हैं... इनके साथ-साथ हमारे पढ़े-लिखे नौजवान युवा साथी ढाबला के सुरेंद्र मेवाड़ा, केदार मेवाड़ा, बिलकिसगंज के नरेश मेवाड़ा, सुरेश मेवाड़ा, गजराज मेवाड़ा, प्रीतम मेवाड़ा, भारत मेवाड़ा, रामबाबू मेवाड़ा, अर्जुन मेवाड़ा रलाबती के राजेश मेवाड़ा, विक्रम मेवाड़ा, थूनां के राजेश मेवाड़ा, प्रह्लाद मेवाड़ा, दुपाड़िया दांगी के गिरवर मेवाड़ा, प्रह्लाद मेवाड़ा, देहरिया कला के राकेश मेवाड़ा, शादीलाल मेवाड़ा, नरेंद्र मेवाड़ा, अनार सिंह मेवाड़ा, ब्रिजिशनगर के प्रेमसिंह मेवाड़ा, राजेश मेवाड़ा ऐसे कई हमारे युवा साथी हैं.... जो समासेवी बनकर समाज में अलख जगाने के काम में जुटे हैं... इतना सब कुछ होने के बाद भी हमारे समाज में आज भी ये कुरीतियां डेरा डाले क्यों बैठी हैं... अब इन्हें जड़ से उखाड़ फेंकने का समय आ गया है.... और हम युवाओं को बिलकुल भी देर नहीं करते हुए अब जुट जाने की जरूरत है.... क्योंकि अब नहीं जागे तो हम कभी नहीं जाग पाएंगे... इसलिए अपने युवा साथियों से इतना ही कहना चाहूंगा... कि कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं होता... तबीयत से एक पत्थर तो उछालो यारों...

धन्यवाद
आपका अपना
महेश मेवाड़ा, पत्रकार
रायपुर (छत्तीसगढ़)

बस्तर की बाजी


बस्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी के तौर पर जाना जाता है... यहां का दशहरा देश ही नहीं विदेशों में भी विख्यात है... लेकिन नक्सली हिंसा की वजह से बस्तर अपनी रंगत खोता जा रहा है... सांसद बलीराम कश्यप के निधन के बाद बस्तर एक बार फिर लोकसभा उपचुनाव को लेकर सुर्खियों में है... बस्तर लोकसभा में चार जिले बीजापुर, नारायणपुर, दंतेवाड़ा और बस्तर आते हैं... जिनमें आठ विधानसभा कोंटा, बीजापुर, दंतेवाड़ा, जगदलपुर, बस्तर, चित्रकूट, नारायणपुर और कोंटागांव के मतदाता मतदान करते हैं.. ये पूरे इलाके धुर नक्सली माने जाते हैं... सबसे खास बात ये कि इन आठ विधानसभा में से सात सीटों पर भाजपा का कब्जा है... वहीं एक सीट कोंटा से कांग्रेस के प्रत्याशी कवासी लखमा ने जीत हासिल की थी...बस्तर लोकसभा के लिए हो रहे उपचुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही माना जा रहा है... भाजपा ने जहां बस्तर में सहानुभुती वोट बटोरने के लिए बलीराम कश्यप के बेटे दिनेश कश्यप पर भरोसा जताया है... दिनेश कश्यप वर्तमान में केंद्रीय सहकारी बैंक के अध्यक्ष हैं... और उनके छोटे भाई केदार कश्यप रमन सरकार में मंत्री हैं... वहीं प्रदेश कांग्रेस की गुटबाजी में इस बार जोगी खेमा बाजी मार ले गया... और विधायक कवासी लखमा पर कांग्रेस ने दाव लगाया है.... कवासी लखमा कोंटा विधानसभा क्षेत्र का तीन बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं... और वर्तमान में वे वहां से विधायक हैं... आम चुनाव की बात करें तो साल 1998 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मानकूराम सोढ़ी को हराकर बलीराम कश्यप पहली बार सांसद बने.. उन्होंने साल 1999 और 2004 में कांग्रेस प्रत्याशी महेंद्र कर्मा को मात दी...जिसके बाद साल 2009 के आम चुनाव में भी भाजपा ने बस्तर टाइगर बलीराम कश्यप पर ही भरोसा जताया... और उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार शंकर सोढ़ी और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के मनीष कुंजाम को हराकर जीत हासिल की... इस लिहाज से भाजपा ने बलीराम कश्यप के बेटे दिनेश कश्यप को लोकसभा उपचुनाव में उम्मीदवार बनाकर साबित कर दिया...कि वो बस्तर में किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहती...