मंगलवार, 25 सितंबर 2012
पाकिस्तान में मुगल-ए-आजम!
मंगलवार, 13 मार्च 2012
'शिव' का सफर
बुधवार, 15 फ़रवरी 2012
फनकार की आपबीती

इंसान के अंदर छिपी प्रतिभा आखिर क्यों दब जाती है। और क्यों ये मतलब परस्त दुनिया एक काबिल इंसान को निराशा के गहरे समंदर में डुबोकर मार देती है। एक फनकार की कहानी सुनकर कुछ ऐसा ही लगा कि मानो जैसे उसने इस मतलबी दुनिया को समझने में भूल की। "मिट नहीं सकता कभी लिखा हुआ तकदीर का"...... संसार फिल्म के इस गीत को वृद्धाश्रम में गुमनामी की जिंदगी बसर कर रहे दिवाकर जोशी ने जब लिखा होगा। तब सोचा भी नहीं होगा कि उनको ऐसे हालातों से गुजरना पड़ेगा। दिवाकर का अतीत जानकर कोई भी हैरत में पड़ जाए कि क्या वाकई किस्मत इतनी करवट बदलती है। उदार प्रवृत्ति के जोशी ने विनोवा भावे की अपील पर बचपन में ही अपने हिस्से की जमीन देश को समर्पित कर दी। और निकल पड़े दुनिया की खाक छानने। बचपन से ही दिवाकर जोशी को गीत-कहानी लिखने का बड़ा शौक था। और यही रूची उन्हें खींचकर मुंबई की गलियों में ले गई। जहां इस फनकार ने राजकपूर की फिल्म आग समेत कई मशहूर गीत और कहानियां लिखी। जिन्हें मोहम्मद रफी और मुकेश जैसे गायकों ने अपनी आवाज से तराशा। राजकपूर की फिल्म आग का गीत "जिंदा हुं इस तरह कि गमे जिंदगी नहीं".... गीत को भी इसी फनकार ने लिखा था। लेकिन इस फनकार की लेखनी के सहारे बुलंदियां हासिल करने वाले फिल्मकारों और मतलब परस्तों ने ही उन्हें बेसहारा छोड़ दिया। अपने साथ हुए इस धोखे से आहत जोशी मुंबई को अलविदा कहकर घर लौट आए। इसके बाद उन्होंने राजनीति का भी रुख किया। और वहां भी उन्होंने अपना लोहा मनवाया। लेकिन यहां भी उन्हें धोखे के सिवा कुछ नहीं मिला। धोखे और अपनों की बेवफाई के बाद जोशी को दर-दर की ठोकरें भी खानी पड़ी। कई दिनों तक उन्हें भूखा रहना पड़ा। और वे बेसहारा यहां-वहां भटकते रहे। आखिर में वे पहुंचे भोपाल के एक वृद्धाश्रम में जहां गैरों से मिला अपनापन और वे वहीं के होकर रह गए। शोहरत और मुकाम के सच्चे हकदार इस फनकार को लोगों ने तो धोखा दिया ही साथ ही किस्मत ने भी इनके साथ खूब आंख-मिचौली खेली और वे गुमनामी के अंधेरों में खोते चले गए। बहरहाल एक बार फिर उन्हें सहारा मिला। और कवि के रूप में फिर से दिवाकर ने जादू बिखेरना शुरू कर दिया। इस तरह एक फनकार ने दुनिया से लड़कर खुद को जिंदा रखा।
रविवार, 5 फ़रवरी 2012
खामोशी...

मेरी खामोशी को तुम, क्यों समझ नहीं पाती हो...
जर्रे-जर्रे में तेरी खुशबू है, फिर मुझकों क्यों नहीं महकाती हो...
दिन-रात तेरी इबादत करता हूं, पर न जाने क्यों डरता हूं...
एक दिन तू मेरा बन जाएगा, ये उम्मीद मैं तुझसे करता हूं...
पर न जाने क्यों मैं डरता हूं, पर न जाने क्यों मैं डरता हूं....
साथ मिले गर तेरा मुझको, तो मैं दुनिया से लड़ जांऊगा...
हर पथ पर चलके साथ तेरे, मैं कुछ ऐसा कर जाऊंगा...
क्यों समझ कर भी तू मुझसे, अनजान बनी रहती है...
खामोशी को पहचानेगी तू, ये उम्मीद में तुझसे करता हूं...
पर न जाने क्यों मैं डरता हूं, पर न जाने क्यों मैं डरता हूं...
क्या डर है तुझको दुनिया का, एक बार बता दे मुझको...
या फिर मैं समझू की, तू है बस एक सुंदर सपना...
जो हर रात मुझे महकाता है, सुबह होते उड़ जाता है...
फिर भी तुझमें कुछ बात है साकी, क्यों मैं तुझसे उम्मीद करता हूं...
पर न जाने क्यों मैं डरता हूं, पर न जाने क्यों मैं डरता हूं...
महेश मेवाड़ा, पत्रकार
अग्निपथ....

वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने हों बड़े,
एक पत्र छांह भी,
मांग मत, मांग मत, मांग मत,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ
तू न थकेगा कभी,
तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ
यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत रक्त से,
लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ
हरिवंश राय बच्चन
मंगलवार, 31 जनवरी 2012
कारवां गुजर गया...

स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क़ बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँ-धुआँ पहन गये,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ जमीन और आसमां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,
वक्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
माँग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरण-चरण,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
ग़ाज एक वह गिरी,
पुंछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी,
और हम अजान से,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
गोपालदास "नीरज"
फिर हारा माटीपुत्र

एक हाथ रोटी बेलता...
दूसरा रोटी खाता...
तीसरा रोटी से खेलता...
ये तीसरा है कौन इसपर संसद भी है मौन...
आज किसानों की हालत कुछ इसी तरह की है... क्या है किसान... कौन है किसान... इससे किसी को वास्ता नहीं... क्योंकि किसान एक ऐसा तबका है... जो फसल उत्पादन का मजदूर है... और उसके उत्पाद का मौल भी वो तैयार करते हैं... जिसका इसकी हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है... मुंशी प्रेमचंद्र के साहित्य गोदान में जो स्थिति धनिया किसान की थी... वो आज भी हमारे आधुनिक भारत के किसान की है... धनिया और उसका परिवार एक गौ यानी गाय के लिए किस तरीके से अपना सब-कुछ न्यौछावर कर देता है... लेकिन उसे छोड़ने को तैयार नहीं... कुछ यही हाल किसान का है... वो भले ही कर्ज के बोझ में दबकर मरने को तैयार हो जाता है... लेकिन अपनी माटी छोड़ने को तैयार नहीं है... और न ही उसे किसी दूसरे को देने के लिए... वाकई आज भले ही कर्ज में डूबकर रोजाना 47 किसान आत्महत्या कर रहे हों... हजारों किसान कुदरत की मार झेलने को मजबूर हैं... लेकिन उन्हें सुनने वाला कौन है... फसल किसान उगाता है... सरकार नहीं... लेकिन फिर भी सरकार के जिम्मेदार तय करते हैं कि फसल खराब हुई है... या नहीं... क्यों उन किसानों से मशविरा नहीं किया जाता कि वाकई उनके खून पसीने से सींची फसल की हकीकत क्या है... सबसे पहले हमे इस बात को समझने की जरूरत है कि किसान आखिर किस वजह से तंग आकर मौत को गले लगा लेता है... क्यों धरती का सीना चीरकर अन्न पैदा करने वाला माटीपुत्र हार जाता है...
महेश मेवाड़ा, पत्रकार
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