मंगलवार, 31 जनवरी 2012

कारवां गुजर गया...


स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क़ बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँ-धुआँ पहन गये,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ जमीन और आसमां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,
वक्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरण-चरण,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
ग़ाज एक वह गिरी,
पुंछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी,
और हम अजान से,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

गोपालदास "नीरज"

फिर हारा माटीपुत्र


एक हाथ रोटी बेलता...
दूसरा रोटी खाता...
तीसरा रोटी से खेलता...
ये तीसरा है कौन इसपर संसद भी है मौन...

आज किसानों की हालत कुछ इसी तरह की है... क्या है किसान... कौन है किसान... इससे किसी को वास्ता नहीं... क्योंकि किसान एक ऐसा तबका है... जो फसल उत्पादन का मजदूर है... और उसके उत्पाद का मौल भी वो तैयार करते हैं... जिसका इसकी हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है... मुंशी प्रेमचंद्र के साहित्य गोदान में जो स्थिति धनिया किसान की थी... वो आज भी हमारे आधुनिक भारत के किसान की है... धनिया और उसका परिवार एक गौ यानी गाय के लिए किस तरीके से अपना सब-कुछ न्यौछावर कर देता है... लेकिन उसे छोड़ने को तैयार नहीं... कुछ यही हाल किसान का है... वो भले ही कर्ज के बोझ में दबकर मरने को तैयार हो जाता है... लेकिन अपनी माटी छोड़ने को तैयार नहीं है... और न ही उसे किसी दूसरे को देने के लिए... वाकई आज भले ही कर्ज में डूबकर रोजाना 47 किसान आत्महत्या कर रहे हों... हजारों किसान कुदरत की मार झेलने को मजबूर हैं... लेकिन उन्हें सुनने वाला कौन है... फसल किसान उगाता है... सरकार नहीं... लेकिन फिर भी सरकार के जिम्मेदार तय करते हैं कि फसल खराब हुई है... या नहीं... क्यों उन किसानों से मशविरा नहीं किया जाता कि वाकई उनके खून पसीने से सींची फसल की हकीकत क्या है... सबसे पहले हमे इस बात को समझने की जरूरत है कि किसान आखिर किस वजह से तंग आकर मौत को गले लगा लेता है... क्यों धरती का सीना चीरकर अन्न पैदा करने वाला माटीपुत्र हार जाता है...

महेश मेवाड़ा, पत्रकार